‍शाहगढ़

750 गढ़ों वाला शाहगढ़

सागर जिले के उत्तर पूर्व में सागर-कानपुर मार्ग पर करीब 70 किमी की दूरी पर स्थि‍त यह कस्‍बा कई ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी है। वनाच्‍छादित उत्तुंग शैलमाला की तराई में लांच नदी के दक्षिणी किनारे पर बसे शाहगढ़ का इतिहास बुंदेलों की वीरता का महत्‍वपूर्ण साक्ष्‍य है। 15वीं शताब्‍दी में यह गांव गौंड़ शासकों के अधीन था। तब यह गढ़ करीब 750 गांवों का था।

गौंड़ शासकों के बाद यह छत्रसाल बुंदेला के अधिकार में आया जिसने यहां एक किलेदार तैनात किया था। छत्रसाल ने इसे अपने पुत्र हिरदेशाह के नाम वसीयत कर दिया था। हिरदेशाह की सन् 1739 में मृत्‍यु हो गई। हिरदे शाह की मौत के बाद उसके कनिष्‍ठ पुत्र पृथ्‍वीराज ने बाजीराव पेशवा की सहायता से इसे अपने अधिकार में ले लिया।

कहा जाता है कि सन् 1759 में जब अहमदशाह अब्‍दाली ने भारत पर आक्रमण किया था तो आक्रांताओं के विरुद्ध मराठाओं ने संघर्ष किया। उनके इस संघर्ष में सहायता के लिए शाहगढ़ से 5000 सैनिकों की एक सेना भेजी गई थी। सन् 1835 में यहां अंग्रेज स्‍लीमैन आया था। उसने अपनी पुस्‍तक “रैंबल्‍स एंड डिक्‍लेक्‍शंस” में शाहगढ़ और उसके शासकों के बारे में विस्‍तार से लिखा है।

बखत बली अर्जुनसिंह का भतीजा था। उसके पास 150 घुड़सवार और करीब 800 पैदल सैनिकों की सेना थी। वह सन् 1857 की क्रांति में शामिल हो गया था। उसने चरखारी पर आक्रमण के समय तात्‍या टोपे की सहायता की थी। बाद में नाना साहिब द्वारा ग्‍वालियर में स्‍थापित शासन में उसे भी सम्मिलित होने को आमंत्रित किया गया था।

सितंबर 1858 में बखत बली को ग्‍वालियर जाते समय अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया था। उसे राजबंदी के रूप में लाहौर भेज दिया गया। वहां उसे मारी दरवाजा में हाकिम राय की हवेली नामक स्‍थान पर रखा गया। बखतबली के राज्‍य को अंग्रेजों ने जब्‍त कर लिया। वह राज्‍य कितना विस्‍तृत था इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसके कई भाग अब सागर, दमोह और झांसी जिलों में शामिल हैं। 29 सिंतंबर 1873 को राजा बखत बली की मृत्‍यु वृंदावन में हुई थी।

अंग्रेजों ने शाहगढ़ को इसी नाम के परगने का मुख्‍यालय बनाया था। इसमें करीब 500 वर्ग किमी में करीब सवा सौ गांव थे। शाहगढ़ में कुछ ऐतिहासिक‍ अवशेष अभी भी हैं। यहां राजा अर्जुनसिंह द्वारा बनवाए गए दो मंदिर हैं। बड़े मंदिर में भित्ति चित्रणों की सजावट है। इसके अतिरिक्‍त यहां चार समाधियां और राज-परिवार की एक विशाल समाधि भी है।

एक समय शाहगढ़ व आसपास के इलाके में कच्‍चे लोहे की खदानें थीं। इन खदानों से निकाला गया लोहा स्‍थानीय पद्धति से गलाया जाता था हालांकि अब इसका कोई विशेष महत्‍व नहीं है। एक समय यहां एक अच्‍छा नरम पत्‍थर मिलता था जिसके कप और गरल बनाए जाते थे। पुराने समय में शाहगढ़ के बने मिट्टी के बर्तन काफी मशहूर थे। इसी कारण वहां एक मिट्टी के बर्तन बनाने का प्रशिक्षण केंद्र भी खोला गया था।

शाहगढ़ में शिवरात्रि के अवसर पर एक मेला लगता है जिसमें आसपास के इलाकों से बड़ी संख्‍या में लोग आते हैं। साप्‍ताहिक हाट की परंपरा आज भी जारी है और शनिवार को कस्‍बे में हाट बाजार भरता है।


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