धामोनी

धामोनी: एक उजड़ी सल्‍तनत

सागर के उत्तर में झांसी मार्ग पर करीब 50 किमी की दूरी पर स्थित धामोनी अब उजाड़ हो चुका है लेकिन इसका ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्व है. गढ़ा मंडला के राज्‍यकाल में महत्वपूर्ण होने के कारण इसे गढ़ बनाया गया था और इसके साथ 50 मौजे थे। गढ़ा मंडला वंश के एक वंशज सूरत शाह ने इस किले को बनाया था।

एक दंत कथा के अनुसार मुगलकाल का मशहूर इतिहासकार अबुल फजल भी यहीं पैदा हुआ था लेकिन इसका कोई प्रमाण आज उपलब्ध नहीं है। आइन-ए-अकबरी में इसका उल्लेख मालवा सूबा में रायसेन की सरकार के महाल के रूप में किया गया है। किसी जमाने में यहां हाथी बेचने के लिए बाजार भरता था। यह ओरछा के वीरसिंहदेव के राज्‍य में (1605-27) सम्मिलित था। उन्होंने किले का फिर से निर्माण कराया था।

पुरातत्‍व की दृष्टि से महत्‍वपूर्ण

पुराने खंडहरों के कारण धामोनी पुरातत्व की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। किले के अलावा यहां रानी महल के नाम से विख्यात एक महल भी है। यहां का एक अन्य उल्लेखनीय स्थान मुस्लिम संतों की दो मजारें भी हैं। इनमें से एक बालजीत शाह की मजार है, जिन्हें अबुल फजल का गुरु समझा जाता है।

दूसरी मजार मस्‍तान शाह वली की मानी जाती है। उनके बारे में कहा जाता है कि गांव में पानी नहीं मिलने के कारण उन्होंने धामोनी को बददुआ दी थी। संतों की मजारों के बारे में कई कथाएं प्रचलित हैं। यहां साल में एक बार गर्मियों के मौसम में उर्स का आयोजन किया जाता है। गांव के किनारे कुछ जैन मंदिर भी हैं, जिनका निर्माण 1815-19 के बीच हुआ था।

कॉपीराइट: डेली हिंदी न्‍यूज डॉट कॉम


सागर जिले के अन्‍य महत्‍वपूर्ण स्‍थान

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*